न सोना तुम
नभ की शमायल साया में,
किशलय की कोमल काया ...में.
तारो की निश्चल छाया में,
चंदा की मोहन माया में,
तू निशा की नसा में.
न सो जाना मन लोभित... तन से,
क्यों की नभ जीवन पहेली है ,
बस तुम्हे फसा रहा,
किशलय सा कोमल बना रहा,
तारे अपने गीतों में है तुमको
बस बसा रहा,
चंदा की मोहन माया में
मोहित न होना तुम प्यारे!
यदि ज्योतिर्मय जीवन पाना है तो,
जाग की उर्वर आंगन में,
मन के काले कोटर में,
जीवन ज्योति को ज्वलित करो,
मन के काले कपट को.
इस ज्योति में ही धूमिल करो!
जैसे दिन के दिनकर ने,
इस नभ के चंदा तेरो को
माया मोहन के यारो को
अपनी प्रकाश की माला से
ज्योति की पवन ज्वाला से,
इस सब को नभ में धूमिल किया?
ज्योति का पवन दीप जला.

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